पत्रकार होना और पत्रकारिता करना दो अलग-अलग सत्य
पत्रकार होना और पत्रकारिता करना दो अलग-अलग सत्य
समस्तीपुर जनक्रांति कार्यालय से लेख राजेन्द्र सिंह जादौन की
आज बाजार और सत्ता ने मिलकर पत्रकारिता को एक चमकदार मंच बना दिया है जहाँ खबरों से ज्यादा चेहरे बिकते हैं। बहसें अब जनता के मुद्दों पर कम और टीआरपी के हिसाब से ज्यादा होने लगी हैं।
इंडिया जनक्रांति न्यूज़ डेस्क, भारत (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय 24 मई 2026)। लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल चुनावों से मजबूत नहीं होती, बल्कि उन संस्थाओं से मजबूत होती है जो सत्ता को उसके दायित्वों का लगातार बोध कराती रहती हैं। न्यायपालिका, प्रशासन और सरकार यदि जनता के प्रति जवाबदेह दिखाई देती है तो उसके पीछे एक बड़ी भूमिका जनपक्षीय पत्रकारिता की होती है। पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं है, यह लोकतंत्र की चेतना है। यह वह आईना है जिसमें सत्ता को अपना असली चेहरा दिखाई देता है।
लेकिन आज के समय में सबसे बड़ा संकट यही है कि पत्रकारिता और पत्रकार होने के बीच का अंतर धीरे-धीरे धुंधला किया जा रहा है। हाथ में माइक पकड़ लेना, गले में प्रेस कार्ड टांग लेना, सोशल मीडिया पर लाइव आ जाना या किसी चैनल का लोगो लगा लेना पत्रकारिता नहीं है। पत्रकार होना एक पहचान हो सकती है, लेकिन पत्रकारिता करना एक जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी सच के पक्ष में खड़े होने की है, उन सवालों को उठाने की है जिनसे व्यवस्था असहज हो जाती है।
आज बाजार और सत्ता ने मिलकर पत्रकारिता को एक चमकदार मंच बना दिया है जहाँ खबरों से ज्यादा चेहरे बिकते हैं। बहसें अब जनता के मुद्दों पर कम और टीआरपी के हिसाब से ज्यादा होने लगी हैं। किसान की आत्महत्या, बेरोजगार युवाओं की पीड़ा, गाँवों की बदहाली, सरकारी भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही जैसे मुद्दे धीरे-धीरे स्क्रीन से गायब होते जा रहे हैं। उनकी जगह शोर, आरोप-प्रत्यारोप और प्रायोजित राष्ट्रवाद ने ले ली है। ऐसे समय में सच्ची पत्रकारिता का महत्व और बढ़ जाता है।
जनपक्षीय पत्रकारिता हमेशा से सत्ता के लिए असुविधाजनक रही है। क्योंकि उसका काम प्रशंसा करना नहीं, सवाल करना होता है। वह सरकार विरोधी नहीं होती, बल्कि जनता के पक्ष में होती है। अगर सड़क टूटी हुई है, अस्पताल में दवाइयाँ नहीं हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, थानों में रिश्वत चल रही है और सरकारी योजनाएँ भ्रष्टाचार में दब रही हैं, तो पत्रकारिता का काम इन मुद्दों को सामने लाना है। यही लोकतंत्र का असली धर्म है।
इतिहास गवाह है कि हर दौर में कुछ पत्रकार ऐसे रहे जिन्होंने अपने शब्दों को बिकने नहीं दिया। उन्होंने सत्ता के दबाव, विज्ञापनों की राजनीति और धमकियों के बावजूद सच लिखने का साहस किया। कई पत्रकार जेल गए, कई पर मुकदमे हुए, कई की नौकरी छिन गई और कई अपनी जान तक गंवा बैठे। लेकिन उन्होंने कलम नहीं छोड़ी। क्योंकि वे जानते थे कि अगर पत्रकारिता डर गई तो लोकतंत्र धीरे-धीरे अंधा हो जाएगा।
आज पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा सुविधाओं के करीब खड़ा दिखाई देता है। सत्ता के गलियारों में घूमना, नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाना और सरकारी विज्ञापनों के लिए समझौते करना अब सामान्य बात बनती जा रही है। लेकिन यह पत्रकारिता नहीं, व्यवस्था का हिस्सा बन जाना है। पत्रकारिता का असली मूल्य तब है जब पत्रकार जनता के बीच खड़ा दिखाई दे, न कि सत्ता के मंच पर।
एक सच्चा पत्रकार वही होता है जो जनता की तकलीफ को अपनी संवेदना से महसूस करे। जिसे यह समझ हो कि उसकी कलम किसी गरीब की आखिरी उम्मीद हो सकती है। गाँव का वह किसान जो तहसील के चक्कर काट-काटकर थक गया है, वह मजदूर जिसकी मजदूरी दबा दी गई है, वह महिला जिसे न्याय नहीं मिल रहा, वह छात्र जिसे व्यवस्था ने बेरोजगार बना दिया इन सबकी आवाज़ अगर कोई बन सकता है तो वह निर्भीक पत्रकारिता है।
लेकिन इसके लिए केवल शब्दों की ताकत काफी नहीं होती। पत्रकारिता में नैतिकता भी उतनी ही जरूरी है। सच्ची बातें तभी प्रभावशाली होती हैं जब उन्हें जीवन में आत्मसात किया जाए। जो पत्रकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखता है, अगर वही निजी स्वार्थों के लिए समझौता कर ले तो उसके शब्द खोखले हो जाते हैं। जो निष्पक्षता की बात करता है, उसे अपने व्यवहार में भी निष्पक्ष होना पड़ेगा। पत्रकारिता केवल दूसरों को आईना दिखाने का काम नहीं है, यह स्वयं को भी लगातार परखने की प्रक्रिया है।
सोशल मीडिया के दौर में सूचना बहुत तेज हो गई है, लेकिन सत्य बहुत कमजोर हो गया है। अब खबरों से ज्यादा अफवाहें फैलती हैं। बिना तथ्यों के आरोप लगाए जाते हैं, भीड़ को भड़काया जाता है और लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे समय में जिम्मेदार पत्रकारिता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। क्योंकि लोकतंत्र झूठ के सहारे ज्यादा समय तक नहीं चल सकता।
आज भी देश के छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों में ऐसे पत्रकार मौजूद हैं जो बिना संसाधनों के लगातार संघर्ष कर रहे हैं। जिनके पास बड़े स्टूडियो नहीं हैं, बड़ी तनख्वाह नहीं है, सुरक्षा नहीं है, लेकिन फिर भी वे सच लिख रहे हैं। वे जानते हैं कि एक खबर किसी गरीब को न्याय दिला सकती है, किसी भ्रष्ट अधिकारी को बेनकाब कर सकती है और किसी प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए मजबूर कर सकती है। यही पत्रकारिता की असली ताकत है।
पत्रकारिता कभी आसान रास्ता नहीं रही। यह ऐसा रास्ता है जहाँ सम्मान से ज्यादा संघर्ष मिलता है। कई बार अपने ही लोग विरोध में खड़े हो जाते हैं। सत्ता नाराज़ होती है, प्रशासन दबाव बनाता है और समाज का एक हिस्सा भी सच सुनना पसंद नहीं करता। लेकिन इसके बावजूद जो व्यक्ति सच के साथ खड़ा रहता है, वही असली पत्रकार कहलाने का अधिकार रखता है।
पत्रकार होना एक पद हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता एक विचार है। पद खत्म हो सकता है, संस्थान बंद हो सकते हैं, चैनल बदल सकते हैं, लेकिन विचार कभी खत्म नहीं होते। सच लिखने वाले लोग हर दौर में पैदा होते रहेंगे। भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ने वाले पत्रकार कल भी थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे। क्योंकि जब तक अन्याय रहेगा, तब तक उसे उजागर करने वाली कलम भी जीवित रहेगी।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि उसमें सवाल पूछने की आजादी होती है। और जब तक यह आजादी बची हुई है, तब तक पत्रकारिता भी जीवित रहेगी। क्योंकि पत्रकारिता केवल खबरों का व्यापार नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक नैतिक दायित्व है। यह जनता की आवाज़ है, लोकतंत्र की सांस है और सच को जिंदा रखने की सबसे बड़ी उम्मीद भी।

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