पत्रकारिता की फ़क़ीरी: सत्य, साधना और कलम की ईमानदारी

पत्रकारिता की फ़क़ीरी: सत्य, साधना और कलम की ईमानदारी

जनक्रांति कार्यालय से राजेन्द्र सिंह जादौन

सच तो यह है कि इस संसार में आने वाला हर व्यक्ति खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही लौट जाता है। इसके बावजूद मनुष्य शान-शौकत, प्रसिद्धि और स्वार्थ के पीछे इस प्रकार भागता है मानो यही जीवन का अंतिम सत्य हो। पत्रकार भी इस मोहजाल से पूर्णतः अछूता नहीं है।

भोपाल, मध्यप्रदेश(जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज़ डेस्क 7 जून 2026)। पत्रकारिता में मैंने कभी धन, वैभव, पद या प्रतिष्ठा की तलाश नहीं की। मेरी खोज तो केवल उस आत्मिक सुकून की रही है, जो सत्य के मार्ग पर चलने वालों को प्राप्त होता है। किंतु सत्य का पथ बड़ा विचित्र होता है। कभी वह सम्मान दिलाता है, कभी अपमान; कभी तालियाँ बटोरता है तो कभी गहरी तन्हाई का अहसास कराता है। फिर भी एक सच्चा पत्रकार उसी राह पर चलता रहता है, क्योंकि उसे मंज़िल से अधिक अपने सफ़र और उद्देश्य पर विश्वास होता है।
सच तो यह है कि इस संसार में आने वाला हर व्यक्ति खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही लौट जाता है। इसके बावजूद मनुष्य शान-शौकत, प्रसिद्धि और स्वार्थ के पीछे इस प्रकार भागता है मानो यही जीवन का अंतिम सत्य हो। पत्रकार भी इस मोहजाल से पूर्णतः अछूता नहीं है। कभी पहचान की चाह, कभी प्रभाव का आकर्षण और कभी सत्ता के निकट पहुँचने की लालसा उसे अपनी मूल साधना से दूर ले जाने लगती है।
मित्र पत्रकार, कभी स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछना कि पत्रकारिता में तुम्हारी वास्तविक तलाश क्या है? धन, पद और प्रसिद्धि या समाज के लिए कुछ सार्थक करने का संतोष? क्योंकि जो वस्तुएँ आज अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत होती हैं, समय की धारा में वे भी बह जाती हैं। प्रेम, मोह, संबंध, प्रशंसा और आलोचना—सब कुछ क्षणभंगुर है। कोई किसी का स्थायी साथी नहीं होता। जीवन के इस विराट मेले में प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूमिका निभाकर आगे बढ़ जाता है।
जब यह सत्य समझ में आने लगता है, तब दिखावे की दुनिया फीकी पड़ने लगती है। तब पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं रह जाती, बल्कि एक साधना का रूप धारण कर लेती है। समाचार केवल सूचनाएँ नहीं रहते, वे समाज के दर्द, संघर्ष और उम्मीदों की आवाज़ बन जाते हैं। तब पत्रकार अपने नाम से नहीं, बल्कि अपने कर्म और चरित्र से पहचाना जाता है।
मन का सुकून बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि भीतर की ईमानदारी में छिपा होता है। जिस दिन पत्रकार अपने कर्तव्य में पूर्ण निष्ठा के साथ रम जाता है, उसी दिन उसे वह शांति प्राप्त होती है जिसकी तलाश वह वर्षों से कर रहा होता है। जैसे खिड़की की मुंडेर पर बैठा कबूतर बिना किसी स्वार्थ के अपनी गुटरगूँ करता रहता है, वैसे ही पत्रकार को भी सत्य का निरंतर जाप करते रहना चाहिए। उसका धर्म है—लिखना, प्रश्न करना और समाज के समक्ष सच को निर्भीकता से प्रस्तुत करना।
जीवन का अंतिम सत्य भी यही है कि एक दिन सब कुछ यहीं रह जाएगा। पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति, पुरस्कार और परिचय—सब समय की धूल बन जाएंगे। अंततः हर मनुष्य का ठिकाना वही श्मशान है, जहाँ सभी भेद मिट जाते हैं। वहाँ न कोई बड़ा होता है, न छोटा; न अमीर, न गरीब; न प्रसिद्ध, न गुमनाम।
यदि कुछ शेष रहता है तो केवल कर्मों की सुगंध। पत्रकार के लिए वही सुगंध उसकी निष्पक्षता, उसकी निर्भीकता और उसकी कलम की ईमानदारी है। जब जीवन की अंतिम यात्रा पूरी हो, तब यह संतोष रहे कि यह देह अग्नि को समर्पित होकर भस्म बनी और वह भस्म सत्य तथा पत्रकारिता के चरणों में अर्पित हो गई।
पत्रकार की वास्तविक फ़क़ीरी यही है कि वह सबके बीच रहकर भी किसी लोभ का दास न बने, सब कुछ देखकर भी सत्य से आँख न चुराए और सब कुछ खोकर भी अपनी कलम की गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखे। यही पत्रकारिता की साधना है, यही उसका तप है और यही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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