जंतर-मंतर पर लाठी क्यों चली—बल्कि बड़ा सवाल यह है कि इस पूरी बर्बरता का असली दोषी कौन है..?
जंतर-मंतर पर लाठी क्यों चली—बल्कि बड़ा सवाल यह है कि इस पूरी बर्बरता का असली दोषी कौन है..?
जनक्रांति कार्यालय से अनुमंडल चीफ ब्यूरो अनीश कुमार सिंह की रिपोर्ट
पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवाओं पर लाठीचार्ज, सवालों के घेरे में व्यवस्था; क्या विरोध की आवाज दबाने से समस्या का समाधान संभव है?
समस्तीपुर, बिहार (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज़ डेस्क 21 जुलाई, 2026)। कल जंतर-मंतर पर हुई घटनाएं लोकतंत्र और युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। पेपर लीक जैसी गंभीर समस्या के खिलाफ आवाज उठा रहे युवाओं पर जिस तरह से लाठियां बरसाई गईं, वह घटना निश्चित रूप से दिल को झकझोर देने वाली है।
सवाल यह है कि क्या लाठीचार्ज के जरिए युवाओं की आवाज दबाई जा सकती है? क्या पेपर लीक नहीं हो रहे हैं? यदि पेपर लीक की घटनाएं सामने आ रही हैं, तो सरकार और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी यह नहीं बनती कि वे पेपर लीक को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाएं?
विरोध प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर लाठियां चलाने से पहले सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि परीक्षाओं की गोपनीयता और पारदर्शिता कायम रहे। आखिर परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक क्यों होता है? इसकी जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती? दोषियों पर कार्रवाई के बजाय विरोध करने वाले युवाओं पर कार्रवाई क्यों?
इतिहास गवाह है कि लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलनों के सामने सरकारों को संवाद का रास्ता अपनाना पड़ा है। महात्मा गांधी के आंदोलनों के दौरान अंग्रेजी सरकार को बातचीत करनी पड़ी। अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान भी तत्कालीन सरकार ने संवाद का रास्ता अपनाया।
लेकिन सवाल यह है कि जब युवा अपने भविष्य और परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर आवाज उठा रहे हैं, तब उनकी बात सुनने के बजाय उन पर लाठियां क्यों बरसाई जा रही हैं?
सोनम वांगचुक के लंबे अनशन के दौरान भी सरकार से संवाद और समाधान की उम्मीद की गई थी। सरकार किसी आंदोलनकारी की सभी मांगों को स्वीकार करे, यह जरूरी नहीं है। यदि सरकार को लगता है कि किसी आंदोलन की मांगें उचित नहीं हैं, तो भी लोकतंत्र में संवाद का रास्ता बंद नहीं होना चाहिए।
सरकार को देश के युवाओं को यह जवाब देना चाहिए कि यदि परीक्षा व्यवस्था में अनियमितताएं नहीं हैं, तो बार-बार पेपर लीक की शिकायतें और आरोप क्यों सामने आते हैं? और यदि कहीं पेपर लीक हुआ है, तो असली दोषियों पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
सबसे दुखद स्थिति यह है कि परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों को ही पुलिस की लाठियों का सामना करना पड़ता है। इससे आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अब व्यवस्था यही चाहती है कि लोग सब कुछ चुपचाप सहते रहें और किसी भी अन्याय के खिलाफ आवाज न उठाएं?
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार नागरिकों को संविधान ने दिया है। असहमति को दबाने के बजाय सुना जाना चाहिए। युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों का समाधान लाठी से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच, जवाबदेही और संवाद से ही संभव है।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि जंतर-मंतर पर लाठी क्यों चली—बल्कि बड़ा सवाल यह है कि इस पूरी बर्बरता का असली दोषी कौन है.?
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक /सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकासित व प्रसारित।

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