कहीं सड़क है तो कहीं पगडंडी, कहीं नल है तो जल नहीं : आखिर विकास की राह में बाधक कौन..?
कहीं सड़क है तो कहीं पगडंडी, कहीं नल है तो जल नहीं : आखिर विकास की राह में बाधक कौन..?
आधी आबादी अब भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित : राजेश कुमार वर्मा
पटना/समस्तीपुर, बिहार (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन कार्यालय न्यूज डेस्क 30 जुलाई, 2026)। शहर हो या गाँव, आज भी बड़ी संख्या में लोग सड़क, नल-जल और नाली जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीवन जीने को मजबूर हैं। कहीं सड़क बनी है तो नाली नहीं, कहीं नल लगाए गए हैं तो उनमें पानी नहीं आता और कहीं आज भी लोग पगडंडियों के सहारे अपनी जिंदगी की यात्रा तय कर रहे हैं। सरकारी योजनाओं के करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गाँवों और कस्बों की लगभग पचास प्रतिशत आबादी आज भी इन सुविधाओं से वंचित दिखाई देती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है—जनता, जिला प्रशासन, ग्राम प्रशासन, राजनीतिज्ञ या पंचायत सरकार के जनप्रतिनिधि..?
विकास के दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर
सरकारें समय-समय पर ग्रामीण विकास, हर घर नल-जल, पक्की सड़क और स्वच्छता अभियान जैसी अनेक योजनाएँ चलाती हैं। अखबारों और सरकारी विज्ञापनों में विकास की तस्वीरें दिखाई जाती हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई कई बार इससे बिल्कुल अलग होती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ऐसे कई गाँव हैं जहाँ बरसात के दिनों में सड़कें दलदल में बदल जाती हैं। नालियों के अभाव में गंदा पानी सड़कों पर बहता है और नल-जल योजना के तहत लगाए गए पाइप और टंकियाँ केवल शोभा की वस्तु बनकर रह गई हैं।
जिम्मेदारी तय करने से बचते अधिकारी
जब कोई नागरिक अपनी समस्या लेकर पंचायत कार्यालय पहुँचता है तो उसे प्रखंड कार्यालय भेज दिया जाता है। प्रखंड स्तर के अधिकारी जिला प्रशासन की ओर इशारा करते हैं और जिला प्रशासन बजट या तकनीकी कारणों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करता है।
बड़े अधिकारी छोटे अधिकारियों पर जिम्मेदारी डालते हैं और छोटे अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर। इस पूरी व्यवस्था में सबसे अधिक पीड़ा आम जनता को झेलनी पड़ती है।
पंचायत सरकार और जनप्रतिनिधियों की भूमिका
पंचायती राज व्यवस्था का उद्देश्य था कि गाँवों का विकास गाँव के स्तर पर ही सुनिश्चित हो सके। ग्राम पंचायतों को कई अधिकार और संसाधन दिए गए, लेकिन अनेक स्थानों पर जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता और राजनीतिक खींचतान के कारण योजनाएँ अधूरी रह जाती हैं।
कई बार आरोप लगते हैं कि योजनाओं का चयन राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर किया जाता है। जिस क्षेत्र में प्रभावशाली लोग रहते हैं, वहाँ सुविधाएँ पहले पहुँचती हैं, जबकि दूर-दराज़ के टोले और गरीब बस्तियाँ उपेक्षित रह जाती हैं।
क्या केवल प्रशासन ही दोषी है..?
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि केवल प्रशासन या जनप्रतिनिधि ही पूरी तरह दोषी हैं। कई बार जनता की उदासीनता, जागरूकता की कमी और सामाजिक एकता का अभाव भी विकास में बाधा बनता है।
ग्राम सभाओं में लोगों की भागीदारी कम होती जा रही है। योजनाओं की निगरानी और सामाजिक जवाबदेही कमजोर पड़ती जा रही है। यदि नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग हों तो व्यवस्था पर सकारात्मक दबाव बनाया जा सकता है।
मीडिया की बदलती भूमिका और सामाजिक चिंता
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाला मीडिया समाज की आवाज माना जाता है, लेकिन आज यह आरोप लगते रहते हैं कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग सत्ता और प्रभावशाली लोगों के करीब होता जा रहा है। ग्रामीण समस्याओं, किसानों की पीड़ा और बुनियादी सुविधाओं के अभाव जैसे मुद्दे अक्सर सुर्खियों से गायब हो जाते हैं।
सोशल मीडिया ने लोगों को अपनी बात रखने का मंच तो दिया है, लेकिन वहाँ भी वास्तविक समस्याओं से अधिक व्यक्तिगत प्रचार और मनोरंजन को प्राथमिकता मिलती दिखाई देती है। गाँवों की बदहाली और आम लोगों की परेशानियाँ कई बार भीड़ में खो जाती हैं।
सामयिक संवाद : आखिर दोषी कौन..?
ग्रामीण नागरिक : हमारे गाँव में नल तो लगा दिया गया, लेकिन आज तक पानी नहीं आया। बरसात में सड़कें टूट जाती हैं। आखिर हमारी सुनवाई कौन करेगा?
पंचायत प्रतिनिधि: हमने कई बार अधिकारियों को पत्र लिखा है, लेकिन बजट और स्वीकृति नहीं मिल पा रही है।
प्रखंड अधिकारी: योजनाएँ चल रही हैं। तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण कुछ कार्यों में देरी हो रही है।
जिला प्रशासन: सरकार की प्राथमिकता है कि हर घर तक सुविधाएँ पहुँचें। स्थानीय स्तर पर निगरानी और सहयोग की आवश्यकता है।
युवा नागरिक : केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा। हमें जवाबदेही तय करनी होगी और विकास को राजनीति से ऊपर रखना होगा।
वरिष्ठ ग्रामीण: जब तक जनता, प्रशासन और जनप्रतिनिधि मिलकर काम नहीं करेंगे, तब तक गाँवों की तस्वीर नहीं बदलेगी।
समाधान क्या है.?
गाँवों और शहरों के समग्र विकास के लिए केवल योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि—
योजनाओं की नियमित निगरानी हो।
ग्राम सभाओं को सक्रिय बनाया जाए।
जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय की जाए।
भ्रष्टाचार और लापरवाही पर सख्त कार्रवाई हो।
मीडिया ग्रामीण समस्याओं को प्रमुखता से उठाए।
जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बने।
निष्कर्ष
कहीं सड़क है तो कहीं पगडंडी, कहीं नल है तो जल नहीं और कहीं नाली का नामोनिशान तक नहीं। यह केवल विकास की विफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था और समाज दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि दोषारोपण की राजनीति से ऊपर उठकर प्रशासन, जनप्रतिनिधि और जनता मिलकर विकास की नई इबारत लिखें। क्योंकि जब तक गाँवों की तस्वीर नहीं बदलेगी, तब तक देश के विकास का सपना अधूरा ही रहेगा।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

Comments