पत्रकार को खबर दिखती है, उसकी भूख नहीं

पत्रकार को खबर दिखती है, उसकी भूख नहीं

समाज को हर घटना की खबर चाहिए, लेकिन खबर जुटाने वाले पत्रकार की मेहनत, खर्च और आमदनी पर सवाल करने वाला कोई नहीं: राजेश कुमार वर्मा 

पत्रकार को अक्सर लोग सिर्फ एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं, जो हर घटना की खबर कैमरे में कैद कर ले, मौके पर पहुंचे, जानकारी जुटाए और उसे अखबार, पोर्टल या सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचा दे। लेकिन इस पूरी तस्वीर के पीछे पत्रकार की अपनी जिंदगी कितनी मुश्किलों से गुजरती है, इस पर शायद ही कोई सोचता है।
किसी कार्यक्रम की सूचना मिलते ही पत्रकार अपनी जेब से पेट्रोल का खर्च निकालकर घटनास्थल तक पहुंचता है। कभी तेज धूप में, कभी बारिश में, तो कभी देर रात तक खड़ा रहकर खबर जुटाता है। नाश्ता हुआ या नहीं, दोपहर का भोजन मिला या नहीं, घर से निकलने के बाद वापस कब लौटेगा—इन सवालों के लिए उसके पास अक्सर समय ही नहीं होता।
लोगों को खबर चाहिए, लेकिन पत्रकार की जरूरतों की खबर किसी को नहीं होती।
किसी आयोजन में पत्रकारों की भीड़ देखकर आयोजक कहते हैं—“इतने पत्रकार आ गए!” लेकिन शायद ही कोई यह पूछता है कि इतनी दूर से आने वाले इन पत्रकारों का आने-जाने का खर्च कैसे चलेगा? उनके परिवार का चूल्हा किससे जलेगा? मोबाइल, इंटरनेट, कैमरा, बाइक, पेट्रोल और दूसरे जरूरी संसाधनों का खर्च कौन उठाएगा?
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब पत्रकार किसी संस्था, व्यवसायी या आयोजनकर्ता से विज्ञापन की बात करता है तो अक्सर मुस्कुराकर जवाब मिलता है—“अभी देखते हैं... बाद में मिलिए।”
लेकिन खबर के लिए बुलाने में कभी “बाद में” नहीं होता।
खबर चाहिए तो पत्रकार तुरंत चाहिए।
कवरेज चाहिए तो पत्रकार समय पर चाहिए।
फोटो चाहिए तो पत्रकार मौके पर चाहिए।
फिर उसकी मेहनत की कीमत तय करने की बारी आती है तो वही पत्रकार अचानक सबको याद नहीं रहता।
यह भी सच है कि पत्रकारिता केवल कमाई का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। पत्रकार समाज और शासन के बीच संवाद का सेतु है। वह जनता की समस्याओं को आवाज देता है, प्रशासन तक सवाल पहुंचाता है और घटनाओं को दस्तावेज के रूप में समाज के सामने रखता है।
लेकिन क्या जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति की आर्थिक जरूरतें खत्म हो जाती हैं?
क्या पत्रकार को भूख-प्यास नहीं लगती?
क्या उसके वाहन में पेट्रोल मुफ्त में आता है?
क्या उसका मोबाइल रिचार्ज मुफ्त होता है?
क्या उसके बच्चों की पढ़ाई और परिवार का खर्च खबरों से अपने आप चल जाता है?
पत्रकार से निष्पक्षता की उम्मीद जरूर कीजिए, लेकिन उसकी मेहनत का सम्मान भी कीजिए। विज्ञापन दीजिए तो उसे एहसान मत समझिए, क्योंकि वह पत्रकार पर नहीं बल्कि आपके अपने संस्थान, प्रतिष्ठान और समाज तक पहुंचने वाले माध्यम पर किया गया सहयोग है।
जरूरत इस बात की है कि पत्रकार को केवल “खबर लेने वाला” नहीं, बल्कि अपने समय, श्रम और संसाधन लगाने वाला पेशेवर व्यक्ति समझा जाए।
क्योंकि पत्रकार जब खबर के लिए आपके दरवाजे पर आता है, तो वह सिर्फ अपना कैमरा या कलम लेकर नहीं आता—वह अपने समय, अपनी मेहनत और अपनी रोजी-रोटी की कीमत भी साथ लेकर आता है।
खबर प्रकाशित होने के बाद तालियां बहुत मिलती हैं, मगर खबर बनाने वाले हाथों की थकान पूछने वाला समाज चाहिए।
याद रखिए—
पत्रकार की कलम तभी तक चलती है, जब तक उसके घर का चूल्हा जलता है।
उसकी खबर को सम्मान देने से पहले, उसकी मेहनत का सम्मान करना सीखिए।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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