वाराणसी के घाट और शाम की गंगा आरती: आस्था, परंपरा और जीवन का अद्भुत संगम

वाराणसी के घाट और शाम की गंगा आरती: आस्था, परंपरा और जीवन का अद्भुत संगम

जनक्रांति कार्यालय से अध्यात्म रिपोर्ट 
गंगा किनारे बसे 84 घाटों में हर घाट की अपनी पहचान, दशाश्वमेध घाट की संध्या आरती में दीप, शंख और घंटियों के बीच माँ गंगा की आराधना

वाराणसी, उत्तरप्रदेश (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज़ डेस्क 14 सितम्बर, 2026)। वाराणसी के घाट क्या हैं..?
वाराणसी में गंगा नदी के किनारे बनी सीढ़ियों वाले तटों को घाट कहा जाता है। लगभग छह किलोमीटर के क्षेत्र में फैले इन घाटों की संख्या करीब 84 मानी जाती है। हर घाट की अपनी अलग पहचान, परंपरा और उपयोग है।
कहीं लोग सुबह गंगा स्नान और पूजा-पाठ करते हैं, तो कहीं नाव की सवारी, ध्यान, योग और रोजमर्रा की गतिविधियां दिखाई देती हैं। वाराणसी के घाट केवल नदी तक पहुंचने की सीढ़ियां नहीं हैं, बल्कि यहां की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इनमें दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और मणिकर्णिका घाट विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
दशाश्वमेध घाट:
दशाश्वमेध घाट वाराणसी के प्रमुख घाटों में शामिल है। शाम के समय यहीं होने वाली भव्य गंगा आरती सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र रहती है। सूर्यास्त के बाद घाट पर श्रद्धालुओं और पर्यटकों की बड़ी भीड़ जुटती है।
मणिकर्णिका घाट:
मणिकर्णिका घाट वाराणसी का प्रमुख अंत्येष्टि स्थल है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में इसे मोक्ष से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। यहां दिन-रात अंतिम संस्कार की प्रक्रिया चलती रहती है।
यहां आने वाले लोगों को विशेष संवेदनशीलता और मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। चिता या अंतिम संस्कार की तस्वीर लेना उचित नहीं है, क्योंकि यह मृतक के परिवार के लिए बेहद निजी और भावनात्मक क्षण होता है।
अस्सी घाट:
दक्षिणी वाराणसी में स्थित अस्सी घाट अपेक्षाकृत शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। सुबह के समय यहां लोग योग, ध्यान, गंगा स्नान और पूजा-पाठ करते दिखाई देते हैं। पहली बार वाराणसी आने वाले लोगों के लिए अस्सी घाट से शहर की घाट संस्कृति को महसूस करना एक अच्छा अनुभव हो सकता है।

शाम की गंगा आरती क्या है..?

हर शाम सूर्यास्त के बाद दशाश्वमेध घाट पर होने वाली गंगा आरती वाराणसी की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक परंपराओं में से एक है। यह केवल पर्यटकों के लिए होने वाला कोई कार्यक्रम नहीं, बल्कि माँ गंगा के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने वाली दैनिक पूजा है।
आरती के दौरान पुजारी लाल और केसरिया वस्त्रों में बड़े-बड़े पीतल के दीप, धूप, शंख और घंटियों के साथ विधिवत पूजा करते हैं। दीपों को विशेष क्रम से घुमाते हुए माँ गंगा की आराधना की जाती है।
शंख और घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चार और जलते हुए दीपों का प्रकाश वातावरण को आध्यात्मिक बना देता है। इसका सरल भाव यही है कि जीवन देने वाली गंगा के प्रति आभार व्यक्त किया जाए और जीवन में अंधकार दूर होकर प्रकाश आने की प्रार्थना की जाए।
आरती की अवधि आम तौर पर करीब 45 मिनट के आसपास हो सकती है।
पहली बार गंगा आरती देखने जा रहे हैं तो रखें इन बातों का ध्यान
अगर आप घाट की सीढ़ियों से आरती देखना चाहते हैं, तो सूर्यास्त से करीब 60 से 75 मिनट पहले पहुंचना बेहतर रहता है। इससे आपको बैठने या देखने के लिए उचित स्थान मिल सकता है।
अगर नाव से आरती देखने की योजना है, तो अस्सी घाट या दशाश्वमेध घाट से पर्याप्त समय पहले नाव ले सकते हैं। नाविक से सुरक्षित दूरी पर रुककर आरती देखने के लिए कहें। गंगा के बीच से आरती का दृश्य अलग और बेहद आकर्षक दिखाई देता है।
आरती के दौरान धार्मिक मर्यादा का ध्यान रखना भी जरूरी है। पुजारियों के सामने से अनावश्यक रूप से न गुजरें और पूजा स्थल पर शोर या असुविधा पैदा करने से बचें। यदि किसी विशेष पूजा स्थल पर जूते उतारने की व्यवस्था हो, तो उसका पालन करें। सादे और मर्यादित वस्त्र पहनना बेहतर है तथा पूजा के दौरान आवाज धीमी रखें।
फोटो खींचते समय भी संवेदनशीलता जरूरी है। बिना फ्लैश के तस्वीरें लेना बेहतर है, लेकिन स्नान, पूजा या धार्मिक गतिविधि में शामिल लोगों की बेहद करीब से तस्वीर उनकी अनुमति के बिना न लें। विशेष रूप से मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार और चिताओं की तस्वीरें लेने से पूरी तरह बचना चाहिए।
गंगा में फूल और दीप से सजाए गए छोटे पत्तल या दोने श्रद्धालुओं की आस्था और प्रार्थना का प्रतीक होते हैं। उन्हें खिलौना न समझें, न छुएं और न ही उन पर पैर रखें।
घाटों पर जाते समय छोटा बैग रखना सुविधाजनक रहता है। ऐसे जूते-चप्पल पहनें जिन्हें आसानी से उतारा जा सके। पानी की बोतल साथ रखी जा सकती है, लेकिन धार्मिक स्थलों की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए।
बनारस की शाम को महसूस करने का सबसे अच्छा तरीका
पहली बार वाराणसी आने वालों के लिए अस्सी घाट से दशाश्वमेध घाट तक शाम के समय धीरे-धीरे पैदल जाना या नाव से घाटों का दृश्य देखना एक यादगार अनुभव हो सकता है।
वाराणसी की खूबसूरती केवल घाटों की रोशनी में नहीं, बल्कि गंगा के किनारे चलती जिंदगी, मंदिरों की घंटियों, नावों की आवाजाही, श्रद्धालुओं की आस्था और सूर्यास्त के बाद नदी पर बिखरते दीपों में दिखाई देती है।
बनारस की शाम को केवल देखना नहीं चाहिए, उसे महसूस करना चाहिए—क्योंकि यहां गंगा के किनारे रोशनी सिर्फ दीपों में नहीं, लोगों की आस्था में भी दिखाई देती है।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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