कसम की कसम! शपथ तो याद रहे, कुर्सी का नशा न चढ़े
कसम की कसम! शपथ तो याद रहे, कुर्सी का नशा न चढ़े
जनक्रांति कार्यालय से जॉली अंकल
बचपन की मम्मी-पापा की कसम से लेकर सत्ता की शपथ तक—वादों की दुनिया में कसम खाना आसान, निभाना सबसे मुश्किल; नेताओं के लिए शपथ पत्र का फ्रेम बने लोकतंत्र का आईना
इंडिया डिजिटल न्यूज डेस्क (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन 29सितम्बर, 2026)।
भारत में खानपान की जितनी अद्भुत विविधता है, उतनी ही विविधता यहां कसम खाने की भी है। कोई सुबह उठते ही गरमा-गरम पराठों और समोसों की कसम खाता है, तो कोई दोपहर में कुरकुरे डोसे का दीवाना होता है। लेकिन अगर थोड़ा गहराई से देखा जाए तो सुबह से रात तक हमारे देश में सबसे ज्यादा जिस चीज का इस्तेमाल होता है, वह है—'कसम'।
बचपन में बात-बात पर विद्या माता की कसम, मम्मी-पापा की कसम या दोस्ती की कसम खाने की जो आदत शुरू होती है, वह उम्र बढ़ने के साथ खत्म नहीं होती, बल्कि उसका रूप और भी वीआईपी और राजसी हो जाता है। वार्ड पार्षद से लेकर विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक, जब कोई नई जिम्मेदारी संभालता है तो सबसे पहले भव्य शपथ ग्रहण समारोह होता है।
नए कड़क कपड़े, मंच की चमक-दमक, बड़े-बड़े चेहरे और सामने संविधान को साक्षी मानकर ली जाने वाली शपथ—ऐसा माहौल बनता है मानो आज से ही जनता के बैंक खाते में खुशियों की लॉटरी लगने वाली हो और नेता जी का हर पल जनसेवा के नाम समर्पित होने वाला हो।
लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है।
कुछ नेता शपथ के भारी-भरकम शब्दों को इतनी तेजी से पढ़ते हैं, मानो पीछे उनकी ट्रेन छूट रही हो। शब्दों का उच्चारण कहीं आगे निकल जाता है और अर्थ पीछे छूट जाता है। फिर कुछ महारथी ऐसे भी होते हैं जो शपथ को बिल्कुल शुद्ध और गंभीरता से पढ़ते हैं। मगर समारोह खत्म होते ही, राजभवन या मंच के बाहर निकलकर जैसे ही चमचमाती गाड़ी की एसी की ठंडी हवा मिलती है, लगता है कि शपथ के सारे शब्द भी उसी हवा में उड़ गए।
टीवी कैमरे के सामने जो चेहरा बेहद विनम्र और मासूम दिखाई देता है, वही चेहरा दफ्तर पहुंचते-पहुंचते कड़क मालिक के अंदाज में नजर आने लगता है। चुनाव से पहले जनता के सामने हाथ जोड़कर झुकने वाले नेता जी कुर्सी मिलते ही कभी-कभी उन्हीं जनता के बीच पहुंच से बाहर हो जाते हैं, जिनके वोट ने उन्हें उस कुर्सी तक पहुंचाया था।
यही लोकतंत्र का सबसे बड़ा व्यंग्य है—जनता हर पांच साल में एक नई कसम पर भरोसा करती है और बदले में उसे अक्सर नए आश्वासन मिलते हैं।
कसम खाना हमारे राजनीतिक जीवन में कभी-कभी ऐसा नुस्खा बन जाता है, जिसे हर मर्ज की दवा समझ लिया जाता है। काम करने का वादा हो, विकास का भरोसा हो या किसी विवाद पर सफाई देनी हो—कसम हमेशा तैयार रहती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कसम खाने में जितनी गंभीरता दिखाई जाती है, उसे निभाने में उतनी ही गंभीरता नजर आए, तो लोकतंत्र की तस्वीर काफी अलग हो सकती है।
इसी समस्या का एक मजेदार और रचनात्मक इलाज जौली अंकल सुझाते हैं। जिस तरह लोग अपने घरों में शादी, पुरस्कार या यादगार पलों की तस्वीरें फ्रेम करवाकर लगाते हैं, उसी तरह हर मंत्री और नेता को अपने शपथ पत्र की एक सुंदर प्रतिलिपि भी फ्रेम करवाकर रखनी चाहिए।
एक फ्रेम सरकारी दफ्तर की मुख्य दीवार पर हो और दूसरा घर के ड्राइंग रूम में सोफे के ठीक सामने।
जब नेता जी मखमली सोफे पर बैठकर चाय की चुस्की लें, किसी फाइल पर दस्तखत करने के लिए पेन उठाएं या किसी महत्वपूर्ण फैसले पर विचार करें, तो सामने टंगा हुआ वही शपथ पत्र उन्हें याद दिलाए कि उन्होंने पद संभालते समय जनता के सामने क्या वादा किया था।
वह फ्रेम सिर्फ कागज नहीं होगा, बल्कि लोकतंत्र का आईना होगा।
जब कोई वीआईपी मेहमान दफ्तर में आएगा तो उसकी नजर भी सबसे पहले उसी शपथ पत्र पर पड़ेगी। इससे कम से कम इतना नैतिक दबाव तो बना रहेगा कि जिस कुर्सी पर बैठकर फैसले लिए जा रहे हैं, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।
क्योंकि लोकतंत्र में नेता जनता के मालिक नहीं, बल्कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि होते हैं। कुर्सी स्थायी नहीं होती, लेकिन उस कुर्सी से जुड़ी जिम्मेदारी बहुत बड़ी होती है। करोड़ों लोगों की उम्मीदें किसी एक शपथ के शब्दों में भले ही समा न पाएं, लेकिन उन शब्दों को निभाने की कोशिश जरूर दिखाई देनी चाहिए।
अगर शपथ केवल मंच पर पढ़े जाने वाला एक औपचारिक पाठ बनकर रह जाए और उसके बाद उसकी याद भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाए, तो शपथ की गरिमा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसलिए देश के सभी जनप्रतिनिधियों से बस इतनी सी विनती है—जो हुआ उसे भूल जाइए, लेकिन जो कसम खाई थी उसे मत भूलिए।
और आज एक नई कसम खाइए—
पद संभालते समय जो कसम खाई थी, उस कसम की कसम कि अब उस कसम को कभी नहीं भूलेंगे।
जब शपथ का हर शब्द कागज से निकलकर काम में दिखाई देगा, जब वादे भाषणों से निकलकर जमीन पर उतरेंगे और जब जनसेवा सिर्फ नारा नहीं बल्कि व्यवहार बनेगी, तभी आम जनता के चेहरे पर वह सच्ची मुस्कान लौटेगी, जिसका वादा हर चुनाव और हर शपथ के साथ किया जाता है।
कसम खाना आसान है, कसम निभाना ही असली परीक्षा है।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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