जब पत्रकारिता खबर से ज्यादा तस्वीरों की होड़ बन जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है,

जब पत्रकारिता खबर से ज्यादा तस्वीरों की होड़ बन जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है,

जनक्रांति कार्यालय रिपोर्ट 
प्रशासन और राजनीतिज्ञों के आगे-पीछे घूमने की प्रवृत्ति से लेकर छोटे पत्रकारों पर दबाव तक—क्या पत्रकारिता अपने मूल धर्म, यानी सच और जनसरोकार से दूर होती जा रही है..?

पत्रकारिता लोकतंत्र का वह महत्वपूर्ण स्तंभ है, जिसका मूल उद्देश्य सत्ता के गलियारों की चमक दिखाना नहीं, बल्कि समाज के उन सवालों को सामने लाना है, जिनकी आवाज अक्सर व्यवस्था तक नहीं पहुंच पाती। पत्रकार का काम किसी अधिकारी, नेता या प्रभावशाली व्यक्ति के साथ तस्वीर खिंचवाना नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं, प्रशासनिक खामियों और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्षता के साथ सामने रखना है।
लेकिन वर्तमान समय में पत्रकारिता के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है—क्या खबर अब प्राथमिकता है या सत्ता और प्रशासन के करीब दिखना?
कई जगहों पर यह देखने को मिलता है कि कुछ पत्रकार प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं के साथ लगातार तस्वीरें खिंचवाने तथा अपनी नजदीकी प्रदर्शित करने की होड़ में नजर आते हैं। सवाल यह नहीं कि पत्रकार किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि से संवाद क्यों करे। संवाद तो पत्रकारिता का आवश्यक हिस्सा है। असली सवाल तब पैदा होता है, जब यह संवाद निष्पक्ष पत्रकारिता के बजाय व्यक्तिगत नजदीकी और प्रभाव का माध्यम बन जाए।
क्या सत्ता से सवाल पूछने वाला पत्रकार ही असली पत्रकार है..?
पत्रकार और प्रशासन के बीच संवाद होना जरूरी है, लेकिन पत्रकारिता की स्वतंत्रता उससे भी ज्यादा जरूरी है। यदि किसी अधिकारी की कार्यशैली पर सवाल उठता है तो पत्रकार को सवाल पूछने का अधिकार होना चाहिए। यदि किसी योजना में गड़बड़ी की शिकायत आती है तो उसकी पड़ताल होनी चाहिए। यदि किसी आम नागरिक को न्याय नहीं मिल रहा है तो उसकी आवाज खबर बननी चाहिए।
लेकिन यदि पत्रकार यह सोचने लगे कि सवाल पूछने से किसी अधिकारी से संबंध खराब हो जाएगा, तो फिर पत्रकारिता का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।
पत्रकार की पहचान उसके संपर्कों से नहीं, उसके सवालों और उसकी खबरों की विश्वसनीयता से होनी चाहिए।
छोटे पत्रकारों पर आरोप और दबाव का सवाल
आज एक और चिंता यह है कि जब कोई पत्रकार स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों, प्रशासनिक व्यवस्था या किसी संस्थान से जुड़े सवाल उठाता है, तो कभी-कभी उसके खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है।
यदि किसी पत्रकार पर गंभीर आरोप लगाया जाता है तो कानून अपना काम करे। जांच हो, साक्ष्य देखे जाएं और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई हो। लेकिन केवल पत्रकार की खबर, सवाल या आलोचना से असहमति के कारण उस पर झूठे या मनगढ़ंत आरोप लगाने की आशंका लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकती है।
कानून का इस्तेमाल पत्रकार को डराने के लिए नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए होना चाहिए।
साथ ही पत्रकारों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। खबर प्रकाशित करने से पहले तथ्य की जांच, दोनों पक्षों का पक्ष लेना और आरोपों को आरोप के रूप में ही प्रस्तुत करना पत्रकारिता की बुनियादी जिम्मेदारी है।
क्या कुछ प्रतिष्ठित पत्रकारों की भूमिका पर भी सवाल उठने चाहिए?
पत्रकारिता में वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पत्रकारों की भूमिका मार्गदर्शक की होनी चाहिए। नए और छोटे पत्रकारों को तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए प्रोत्साहित करना, उन्हें सही दिशा देना और उनके अधिकारों की रक्षा करना पत्रकारिता की स्वस्थ परंपरा है।
लेकिन यदि कोई वरिष्ठ पत्रकार किसी छोटे पत्रकार की आवाज दबाने के बजाय उसे हतोत्साहित करने लगे, अथवा किसी प्रशासनिक या राजनीतिक व्यवस्था के अत्यधिक करीब जाकर दूसरे पत्रकारों पर प्रभाव डालने की कोशिश करे, तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पत्रकारिता में कोई स्थायी बड़ा या छोटा नहीं होता। बड़ा वही है जिसकी खबर जनता के भरोसे पर खरी उतरती है।
फोटो से ज्यादा जरूरी है जनता की आवाज
किसी मंत्री, सांसद, विधायक, अधिकारी या बड़े नेता के साथ तस्वीर होना अपने आप में पत्रकारिता की उपलब्धि नहीं है। उपलब्धि तब है, जब उसी नेता या अधिकारी से जनता के सवाल पूछे जाएं।
बाढ़ में डूबे गांव की समस्या, टूटी सड़क, बिजली संकट, अस्पताल की अव्यवस्था, स्कूल में शिक्षक की कमी, भ्रष्टाचार की शिकायत, किसानों की परेशानी, बेरोजगार युवाओं की चिंता और आम आदमी की रोजमर्रा की समस्याएं—यही वे विषय हैं, जिन पर पत्रकारिता को अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए।
यदि कैमरा जनता की समस्या छोड़कर केवल मंच और वीआईपी तस्वीरों तक सीमित हो जाए, तो पत्रकारिता का जनसरोकार कमजोर होना स्वाभाविक है।
समाचार संपादन में भी निष्पक्षता जरूरी
समाचार संपादन पत्रकारिता का बेहद संवेदनशील हिस्सा है। किसी खबर में किस तथ्य को प्रमुखता दी जाए, किस पक्ष को स्थान मिले और किस मुद्दे को नजरअंदाज किया जाए—इन फैसलों का सीधा असर समाज पर पड़ता है।
यदि समाचार संपादन व्यक्तिगत संबंधों, राजनीतिक पसंद-नापसंद या प्रशासनिक दबाव से प्रभावित होने लगे तो खबर और प्रचार के बीच की सीमा मिटने लगती है।
समाचार किसी व्यक्ति को खुश करने के लिए नहीं, पाठक को सही जानकारी देने के लिए होना चाहिए।
पत्रकारिता का असली चेहरा क्या होना चाहिए?
पत्रकार को न प्रशासन का विरोधी होना चाहिए और न उसका समर्थक। पत्रकार को राजनीतिक दल का कार्यकर्ता भी नहीं होना चाहिए और किसी अधिकारी का प्रवक्ता भी नहीं।
पत्रकार की निष्ठा सत्य, संविधान, कानून और जनता के प्रति होनी चाहिए।
जहां प्रशासन अच्छा काम कर रहा हो, वहां उसकी सराहना होनी चाहिए। जहां प्रशासन से गलती हो रही हो, वहां सवाल भी उठने चाहिए। जहां राजनेता जनहित में काम कर रहे हों, वहां खबर बने और जहां जनता के हितों की अनदेखी हो रही हो, वहां भी सवाल उठना चाहिए।
यही संतुलन पत्रकारिता को पत्रकारिता बनाता है।
आखिर पत्रकारिता किसके लिए?
यह सवाल आज हर पत्रकार को स्वयं से पूछने की जरूरत है—
क्या हम खबर इसलिए कर रहे हैं कि जनता को सच्चाई पता चले?
या
इसलिए कि हमारी तस्वीर किसी बड़े अधिकारी या नेता के साथ प्रकाशित हो?
क्या हम प्रशासन से इसलिए मिलते हैं कि जनता की समस्याओं का समाधान खोज सकें?
या इसलिए कि हमारी व्यक्तिगत पहुंच मजबूत हो?
क्या हम छोटे पत्रकार को आगे बढ़ाना चाहते हैं?
या उसे इसलिए दबाना चाहते हैं क्योंकि उसकी स्वतंत्र आवाज किसी स्थापित व्यवस्था के लिए असहज सवाल खड़े करती है?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि आने वाले समय में पत्रकारिता जनता का भरोसा मजबूत करेगी या धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खोती जाएगी।
निष्कर्ष
पत्रकारिता की गरिमा किसी प्रेस कार्ड, बड़े संस्थान, अधिकारी के साथ तस्वीर या राजनीतिक संपर्क से नहीं बनती। पत्रकारिता की गरिमा सच लिखने के साहस, तथ्य जांचने की ईमानदारी और कमजोर की आवाज बनने की प्रतिबद्धता से बनती है।
प्रशासन और पत्रकार के बीच स्वस्थ संवाद लोकतंत्र के लिए जरूरी है, लेकिन नजदीकी और निष्पक्षता के बीच की सीमा हमेशा स्पष्ट रहनी चाहिए।
आज जरूरत इस बात की है कि पत्रकार अपने पेशे के मूल उद्देश्य को फिर से याद करें—सत्ता के साथ खड़े होने के बजाय सत्ता से सवाल पूछना और जनता की आवाज को व्यवस्था तक पहुंचाना।
क्योंकि जिस दिन पत्रकार सवाल पूछना छोड़ देगा, उस दिन खबर तो प्रकाशित होगी, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा कमजोर पड़ जाएगी।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/सम्पादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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