50 साल पुराना याराना: दोस्ती की ऐसी मिसाल, जहां दोस्त ही बन गया परिवार

50 साल पुराना याराना: दोस्ती की ऐसी मिसाल, जहां दोस्त ही बन गया परिवार

जनक्रांति कार्यालय से जॉली अंकल की रिपोर्ट 
आधी चाय और एक समोसे से शुरू हुआ दोस्ती का सफर, संकट की घड़ी में गुलशन ने निभाया साथ; पांच दशक बाद भी कायम है दोस्ती की वही मिठास

50 साल की दोस्ती की अनमोल कहानी

ज़िंदगी के लंबे और उतार-चढ़ाव से भरे सफर में इंसान न जाने कितने लोगों से मिलता है। कुछ रिश्ते वक्त के साथ पीछे छूट जाते हैं, तो कुछ यादों में सिमटकर रह जाते हैं। लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जो समय की हर कसौटी पर खरे उतरते हैं। सच्ची दोस्ती भी ऐसा ही एक अनमोल रिश्ता है, जिसमें एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार कर खूबियों को अपनाया जाता है। गुलशन और जौली की दोस्ती इसकी एक खूबसूरत मिसाल है, जो पिछले 50 वर्षों से लगातार कायम है।

आज से ठीक पांच दशक पहले, जब गुलशन और जौली दोनों अविवाहित थे, तब एक निजी कंपनी के दफ्तर में उनकी पहली मुलाकात हुई थी। नौकरी के शुरुआती दिन संघर्षों से भरे थे। महीने के आखिरी दिनों में जब जेब में गिने-चुने रुपये बचते थे, तब भी दोनों के चेहरे पर मुस्कान बनी रहती थी। जौली अंकल अपने मजाकिया अंदाज में कहते, "भाई गुलशन, समोसा तू चबा ले और आलू मैं खा लेता हूं!"

आधी चाय और एक समोसे को मिल-बांटकर खाने के उन दिनों ने उनकी दोस्ती की ऐसी नींव रखी, जो समय के साथ और भी मजबूत होती चली गई।

मेहनत से कारोबार तक, एक नाम बन गई जोड़ी

समय बदला और दोनों ने अपनी मेहनत, लगन और आपसी विश्वास के दम पर एक छोटा-सा कारोबार शुरू किया। कारोबार के सिलसिले में शहर से बाहर रहने वाले व्यापारी भी दोनों की एक जैसी सोच और तालमेल देखकर हैरान रह जाते थे। उनकी समझ और विचारों में इतनी समानता थी कि लोग उन्हें दो अलग-अलग व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ही जोड़ी के रूप में पहचानने लगे। धीरे-धीरे उनकी पहचान 'गुलशन-जौली' के नाम से होने लगी।

हंसी-मजाक और खुशियों के बीच जिंदगी ने कई कठिन परीक्षाएं भी लीं। एक दिन उनकी कार का शीशा तोड़कर किसी ने बैग चुरा लिया। उस बैग में कारोबार से जुड़े लाखों रुपये के महत्वपूर्ण कागजात रखे थे। कागजात गायब होने से कारोबार पर संकट मंडराने लगा और ग्राहकों की नाराजगी भी बढ़ने लगी।

जौली के चेहरे पर चिंता देखकर गुलशन ने उनका हाथ थामा और हौसला देते हुए कहा, "अरे यार, सिर्फ कागजात ही तो गए हैं! हमारी अक्ल और तेरी-मेरी जोड़ी तो सलामत है। कागजात दोबारा बन जाएंगे, तू बस हिम्मत मत हार। जब तक हम साथ हैं, कोई भी मुश्किल हमें तोड़ नहीं सकती।"

गुलशन के इन शब्दों ने जौली को मुश्किल वक्त में संभलने की ताकत दी। यही वह भरोसा था, जिसने उनकी दोस्ती को महज साथ काम करने वाले दो लोगों के रिश्ते से कहीं आगे पहुंचा दिया।

दोस्ती की खातिर दांव पर लगा दी पूरी जमापूंजी

कारोबार का संकट अभी पूरी तरह दूर भी नहीं हुआ था कि जिंदगी ने जौली के परिवार के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। उनकी पत्नी कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गईं। इलाज का लंबा सिलसिला शुरू हुआ और परिवार पर आर्थिक व मानसिक दबाव बढ़ने लगा।

ऐसे कठिन समय में गुलशन ने दोस्ती का ऐसा फर्ज निभाया, जिसे भुला पाना आसान नहीं। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत जमापूंजी और कारोबार से होने वाला लाभ जौली की पत्नी के इलाज में लगा दिया। जब लोगों ने उनसे सवाल किया कि वे कारोबार की कमाई इस तरह क्यों खर्च कर रहे हैं, तो उनका जवाब था, "जौली का परिवार मेरा अपना परिवार है। पैसे का क्या है, वह तो फिर कमा लेंगे!"

अस्पतालों के चक्कर, इलाज की चिंता और आईसीयू के बाहर बिताई गई लंबी रातों के बीच गुलशन अपने दोस्त के परिवार के साथ खड़े रहे। उनकी मदद, हौसले और अपनापन ने जौली को उस कठिन दौर में अकेला महसूस नहीं होने दिया। यह दोस्ती केवल शब्दों तक सीमित नहीं थी, बल्कि जरूरत के समय त्याग और जिम्मेदारी निभाने का नाम बन गई थी।

पांच दशक बाद भी बरकरार है दोस्ती की मिठास

वक्त का पहिया लगातार घूमता रहा। दोनों की शादियां हुईं, बच्चे बड़े हुए और अब दोनों नाती-पोतों वाले हो चुके हैं। जिंदगी की जिम्मेदारियां बदलीं, उम्र का असर चेहरों पर दिखने लगा और सिर के बाल सफेद हो गए, लेकिन उनकी दोस्ती की चमक आज भी वैसी ही है।

जौली अंकल अक्सर मुस्कुराते हुए कहते हैं, "मैंने तो ईश्वर से बस एक ऐसा दोस्त मांगा था, जो दिल के करीब हो, लेकिन ऊपर वाले ने मुझे गुलशन देकर खुशियों की पूरी दुकान ही दे दी!"

उनकी यह बात बताती है कि सच्चा दोस्त जिंदगी में कितना बड़ा सहारा बन सकता है। ऐसा दोस्त, जिसके सामने अपनी परेशानी बताने के लिए शब्दों की जरूरत न पड़े और जिसकी मौजूदगी मात्र से मन को सुकून मिल जाए।

डिजिटल दोस्तों के दौर में सच्ची दोस्ती का संदेश

आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया पर सैकड़ों दोस्त बनाना आसान है, लेकिन मुश्किल वक्त में साथ खड़ा होने वाला सच्चा दोस्त मिलना उतना ही कठिन है। छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों में दूरी बढ़ जाती है और कई बार लोग अपने संबंधों को इस आधार पर परखने लगते हैं कि किसने किसके लिए क्या किया।

गुलशन और जौली की 50 साल पुरानी दोस्ती नई पीढ़ी को संदेश देती है कि सच्चे रिश्ते स्वार्थ और अपेक्षाओं के तराजू पर नहीं तौले जाते। दोस्ती में रोज मिलना जरूरी नहीं, बल्कि दिलों का जुड़ा रहना जरूरी है। एक फोन कॉल, कुछ आत्मीय शब्द और मुश्किल समय में दिया गया साथ भी किसी की जिंदगी में बड़ी राहत ला सकता है।

जौली अंकल का मानना है कि हर इंसान की जिंदगी में कम से कम एक-दो ऐसे खास दोस्त जरूर होने चाहिए, जिनसे भले ही रोज मुलाकात न हो, लेकिन भरोसे और अपनापन की डोर कभी कमजोर न पड़े।

दोस्ती, जो वक्त के साथ और भी अनमोल हो गई

गुलशन और जौली की कहानी केवल दो दोस्तों की कहानी नहीं, बल्कि विश्वास, त्याग, समर्पण और जीवनभर साथ निभाने की भावना का प्रतीक है। आधी चाय और एक समोसे से शुरू हुआ सफर आज पांच दशक की यादों, संघर्षों और खुशियों का खजाना बन चुका है।

जब भी दोनों साथ बैठकर पुराने दिनों को याद करते हैं, तो उनकी आंखों में वही पुरानी चमक लौट आती है। उनकी दोस्ती यह एहसास कराती है कि उम्र बढ़ने से चेहरे पर झुर्रियां भले ही आ जाएं, लेकिन सच्चे रिश्तों की गर्माहट कभी कम नहीं होती।

कहते हैं कि अंधेरे में सच्चे दोस्त के साथ चलना, अकेले रोशनी में चलने से कहीं बेहतर है। गुलशन और जौली का पांच दशक पुराना याराना इसी कहावत को सच साबित करता है।

आखिर में जौली अंकल अपने प्यारे दोस्त गुलशन के लिए दिल से यही दुआ करते हैं—

"मेरे दिल की ये दुआ है, कभी दूर तू न जाए,
तेरे बिना हो जीना, वो दिन कभी न आए।"
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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