शारदीय नवरात्र का शुभारंभ आज, सुबह 6:14 से 10:35 बजे तक कलश स्थापना का उत्तम मुहूर्त
शारदीय नवरात्र का शुभारंभ आज, सुबह 6:14 से 10:35 बजे तक कलश स्थापना का उत्तम मुहूर्त
जनक्रांति कार्यालय रिपोर्ट
मिथिला पंचांग के अनुसार 11 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक चलेगा दुर्गा पूजनोत्सव, हाथी पर आगमन और गमन को माना गया शुभता का संकेत
मधुबनी/समस्तीपुर,बिहार(जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन डिजिटल न्यूज डेस्क 11 अक्टूबर,2026)। शारदीय नवरात्र को लेकर मिथिलांचल में श्रद्धा और भक्ति का माहौल है। रविवार, 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र का शुभारंभ हो रहा है। नवरात्र के प्रथम दिन कलश स्थापना, मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और व्रत का संकल्प लिया जाएगा। मिथिला क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार, कलश स्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 14 मिनट से 10 बजकर 35 मिनट तक का समय अति उत्तम बताया गया है।
स्टेशन चौक स्थित हनुमान प्रेम मंदिर के पुजारी पंडित पंकज झा शास्त्री ने बताया कि नवरात्र में कलश स्थापना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आदि शक्ति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के आह्वान का प्रतीक है। कलश को संपूर्ण ब्रह्मांड का लघु स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलश के मूल में ब्रह्मा, कंठ में भगवान शिव और मुख में भगवान विष्णु का वास होता है। वहीं, इसके मध्य भाग में मातृशक्तियों और देवी-देवताओं का निवास माना गया है।
कलश स्थापना का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
पंडित पंकज झा शास्त्री के अनुसार, मिट्टी का कलश मानव शरीर की नश्वरता का प्रतीक है, जबकि उसमें भरा शुद्ध जल जीवन, चेतना और आंतरिक पवित्रता को दर्शाता है। कलश में रखा जल शांति और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है, जो साधक के मन को शांत और एकाग्र करने का संदेश देता है।
कलश पर रखे आम या पंचपल्लव के पत्ते प्रकृति, हरियाली और पांच ज्ञानेंद्रियों के प्रतीक माने जाते हैं। वहीं, ऊपर रखा नारियल यानी श्रीफल पूर्णता, शुभता और दिव्य चेतना का प्रतीक है। कलश स्थापना के माध्यम से भक्त अपने घरों में पवित्रता और सकारात्मकता का आह्वान करते हुए नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना का संकल्प लेते हैं।
मिट्टी या तांबे का कलश माना गया उत्तम
पंडित पंकज झा शास्त्री ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मिट्टी या तांबे के कलश का प्रयोग उत्तम माना जाता है। मिट्टी का कलश पृथ्वी तत्व का प्रतीक है, जबकि तांबे के पात्र का प्रयोग पारंपरिक पूजा-पद्धतियों में विशेष महत्व रखता है। कलश में जल के साथ सुपारी, अक्षत और परंपरा के अनुसार अन्य पूजन सामग्री रखी जाती है। कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते और ऊपर नारियल स्थापित किया जाता है।
नवरात्र में कलश स्थापना के साथ जौ बोने की भी परंपरा है। धार्मिक दृष्टि से जौ को समृद्धि, उर्वरता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। नवरात्र के दौरान जौ का अंकुरित होना भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।
हाथी पर मां दुर्गा के आगमन और गमन की मान्यता
मिथिला क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार, इस वर्ष मां दुर्गा के आगमन और गमन का वाहन हाथी बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं में हाथी को शुभता, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, देवी के आगमन और प्रस्थान के वाहन का निर्धारण पंचांग में निर्धारित वार और तिथि के आधार पर किया जाता है।
11 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक नवरात्र पूजा का क्रम
मिथिला क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार नवरात्र के दौरान तिथि और पूजा का क्रम इस प्रकार बताया गया है—
11 अक्टूबर, रविवार: प्रतिपदा तिथि रात्रि 8:48 बजे तक। इसके बाद द्वितीया तिथि आरंभ। शारदीय नवरात्र का शुभारंभ, कलश स्थापना, दुर्गा पूजनोत्सव, नवरात्र व्रतारंभ और मां शैलपुत्री की पूजा।
12 अक्टूबर, सोमवार: द्वितीया तिथि रात्रि 9:27 बजे तक। इसके बाद तृतीया तिथि आरंभ। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा और रेमन्त पूजा।
13 अक्टूबर, मंगलवार: तृतीया तिथि रात्रि 10:30 बजे तक। इसके बाद चतुर्थी तिथि आरंभ। मां चंद्रघंटा की पूजा।
14 अक्टूबर, बुधवार: चतुर्थी तिथि रात्रि 12:03 बजे तक। इसके बाद पंचमी तिथि आरंभ। श्री गणेश चतुर्थी व्रत और मां कूष्मांडा की पूजा।
15 अक्टूबर, गुरुवार: पंचमी तिथि रात्रि 1:53 बजे तक। इसके बाद षष्ठी तिथि आरंभ। मां स्कंदमाता की पूजा।
16 अक्टूबर, शुक्रवार: षष्ठी तिथि रात्रि 3:58 बजे तक। इसके बाद सप्तमी तिथि आरंभ। मां कात्यायनी की पूजा और बिल्वाभिमंत्रण (बेलनौती)।
17 अक्टूबर, शनिवार: सप्तमी तिथि सुबह 6:05 बजे तक। इसके बाद अष्टमी तिथि आरंभ। मां कालरात्रि की पूजा, महासप्तमी, पत्रिका प्रवेश और सरस्वती पूजन।
18 अक्टूबर, रविवार: अष्टमी तिथि पूरे दिन और रात्रि। मां महागौरी की पूजा, निशा पूजा, रात्रि जागरण और महाष्टमी व्रत।
19 अक्टूबर, सोमवार: अष्टमी तिथि सुबह 8:04 बजे तक। इसके बाद नवमी तिथि आरंभ। उदया तिथि के अनुसार मां गौरी की पूजा और संधि पूजा।
20 अक्टूबर, मंगलवार: नवमी तिथि सुबह 9:46 बजे तक। इसके बाद दशमी तिथि आरंभ। महानवमी व्रत, त्रिशूलनी पूजा और मां सिद्धिदात्री की पूजा।
21 अक्टूबर, बुधवार: दशमी तिथि सुबह 11:02 बजे तक। इसके बाद एकादशी तिथि आरंभ। विजयादशमी, नवरात्र पारण, देवी विसर्जन और अपराजिता पूजा।
श्रद्धा और भक्ति के साथ मां दुर्गा की आराधना
नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु व्रत, जप, ध्यान और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से सुख-समृद्धि, शांति और कल्याण की कामना करते हैं। कलश स्थापना से शुरू होकर विजयादशमी तक चलने वाला यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय और शक्ति की उपासना का संदेश देता है।
नोट: कलश स्थापना और पूजा के समय का निर्धारण स्थानीय पंचांग तथा परंपरा के अनुसार करें। प्रकाशित तिथियों और मुहूर्त को अंतिम रूप देने से पहले पंचांग से मिलान करना उचित होगा।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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