मां कुष्मांडा की आराधना से दूर होता है अंधकार, सृष्टि में ऊर्जा और प्रकाश का संचार
मां कुष्मांडा की आराधना से दूर होता है अंधकार, सृष्टि में ऊर्जा और प्रकाश का संचार
जनक्रांति कार्यालय से पंकज झा शास्त्री की रिपोर्ट
शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की हुई विधि-विधान से पूजा-अर्चना, चौथे दिन मां कुष्मांडा की आराधना की तैयारी; स्टेशन चौक स्थित हनुमान प्रेम मंदिर के पुजारी पंडित पंकज झा शास्त्री ने बताया मां कुष्मांडा का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व
नवरात्र में भक्तिमय हुआ शहर का माहौल
मधुबनी/समस्तीपुर, बिहार (जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन डिजिटल न्यूज डेस्क 13 अक्टूबर,2026)। शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन शहर के विभिन्न पूजा पंडालों और मंदिरों में मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना धूमधाम और विधि-विधान के साथ की गई। सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। भक्तों ने मां के दरबार में माथा टेककर सुख, शांति, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा शक्ति, शौर्य, साहस और शांति की प्रतीक हैं। उनकी आराधना से भक्तों को भय और नकारात्मकता से मुक्ति पाने की प्रेरणा मिलती है।
चौथे दिन मां कुष्मांडा की होगी आराधना
नवरात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कुष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं में मां कुष्मांडा को सृष्टि की आदिशक्ति और ब्रह्मांड की रचयिता माना गया है। मान्यता है कि जब चारों ओर घना अंधकार था और सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब मां ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की और संपूर्ण सृष्टि में प्रकाश का संचार किया। इसी कारण उन्हें सृजन, ऊर्जा और जीवन की देवी के रूप में पूजा जाता है।
पौराणिक मान्यताओं में ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन
स्टेशन चौक स्थित हनुमान प्रेम मंदिर के पुजारी पंडित पंकज झा शास्त्री के अनुसार, मां कुष्मांडा की महिमा का वर्णन विभिन्न धार्मिक मान्यताओं में मिलता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, सृष्टि के आरंभ में जब चारों ओर अंधकार व्याप्त था, तब मां की दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। इसे प्रतीकात्मक रूप से ऊर्जा के एक विशाल स्रोत और सृष्टि के आरंभ से जोड़कर देखा जाता है।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर आधुनिक विज्ञान में भी बिग बैंग सिद्धांत प्रमुख है। इसके अनुसार, ब्रह्मांड की शुरुआत लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले अत्यंत गर्म और सघन अवस्था से हुई थी। हालांकि, धार्मिक मान्यताएं और वैज्ञानिक सिद्धांत ब्रह्मांड की उत्पत्ति को अलग-अलग दृष्टिकोण से समझाते हैं।
सूर्य की ऊर्जा से भी जुड़ी हैं मां कुष्मांडा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कुष्मांडा का निवास सूर्यमंडल के भीतर माना जाता है। उन्हें सूर्य के तेज और ऊर्जा को धारण करने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है। वहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सूर्य पृथ्वी सहित पूरे सौरमंडल के लिए प्रकाश और ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा पृथ्वी पर जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस प्रकार मां कुष्मांडा की आराधना को आध्यात्मिक रूप से ऊर्जा, प्रकाश, सृजन और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। नवरात्र के चौथे दिन श्रद्धालु मां की पूजा कर जीवन में उत्साह, शक्ति, समृद्धि और सुख-शांति की कामना करते हैं।
ज्योतिष में सूर्य से जुड़ी हैं मां कुष्मांडा
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मां कुष्मांडा का संबंध सूर्य ग्रह से जोड़ा जाता है। सूर्य को आत्मविश्वास, आत्मबल, यश, मान-सम्मान और नेतृत्व क्षमता का कारक माना जाता है। मान्यता है कि मां कुष्मांडा की श्रद्धापूर्वक आराधना करने से भक्तों को सकारात्मक ऊर्जा, आत्मबल और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
नवरात्र का चौथा दिन मां कुष्मांडा की भक्ति, साधना और आराधना को समर्पित है। इस अवसर पर श्रद्धालु मां के दर्शन-पूजन कर परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में सकारात्मकता बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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