शारदीय नवरात्रि: मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना के साथ निभाई गई बेलनौती की परंपरा
शारदीय नवरात्रि: मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना के साथ निभाई गई बेलनौती की परंपरा
जनक्रांति कार्यालय से पंकज झा शास्त्री की रिपोर्ट
गाजे-बाजे और पारंपरिक मैथिली देवी गीतों के साथ बेल वृक्ष का हुआ पूजन, महा सप्तमी पर नवपत्रिका प्रवेश के बाद खुलेंगे माता के पट
समस्तीपुर/मधुबनी,बिहार ( जनक्रांति हिन्दी न्यूज बुलेटिन डिजिटल न्यूज डेस्क 16 अक्टूबर,2026)। शारदीय नवरात्रि के छठे दिन जिला मुख्यालय सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों में मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ की गई। सुबह से ही मंदिरों और पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती रही। भक्तों ने माता के दर्शन कर सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना की। मंदिरों एवं पूजा समितियों की ओर से सुबह-शाम विशेष आरती और दुर्गा सप्तशती के पाठ किए जा रहे हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय बना हुआ है।
मिथिला की अनूठी परंपरा है बेलनौती
षष्ठी तिथि पर मिथिलांचल की प्रसिद्ध दुर्गा पूजा परंपरा के तहत बेलनौती, जिसे विल्वाभिमंत्रण भी कहा जाता है, का अनुष्ठान किया गया। मधुबनी स्टेशन चौक स्थित हनुमान प्रेम मंदिर के पुजारी पंडित पंकज झा शास्त्री ने बताया कि बेलनौती मां दुर्गा को पृथ्वी पर पधारने के लिए आमंत्रित करने की अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा है।
इस अनुष्ठान में आचार्य, श्रद्धालु और पूजा समिति के सदस्य गाजे-बाजे, ढोल-नगाड़े, शंख ध्वनि तथा पारंपरिक मैथिली भगवती गीतों के साथ बेल वृक्ष के पास पहुंचते हैं। वहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर माता को आमंत्रित किया जाता है। विशेष रूप से जोड़ा बेल वाले वृक्ष की पूजा का महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, बेल वृक्ष भगवान शिव और देवी भगवती से जुड़ा पवित्र प्रतीक है। इस दौरान प्रतीकात्मक डोली भी साथ ले जाई जाती है।
महा सप्तमी पर होगी बेल तोड़ी और नवपत्रिका प्रवेश की रस्म
दुर्गा पूजा में महा सप्तमी के दिन नवपत्रिका प्रवेश प्रमुख अनुष्ठानों में से एक है। पंडित पंकज झा शास्त्री के अनुसार, षष्ठी तिथि को जिस बेल वृक्ष का निमंत्रण दिया जाता है, महासप्तमी के दिन उसी वृक्ष की विशेष पूजा और आरती के बाद आचार्य द्वारा बेल तोड़ी की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
जोड़े बेल को मां दुर्गा के स्वरूप के रूप में मानकर विधिपूर्वक डोली में स्थापित किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु माता के जयकारे लगाते हुए गाजे-बाजे और ढोल-नगाड़ों के साथ उसे पूजा पंडाल तक लाते हैं। पंडाल के प्रवेश द्वार पर विशेष पूजा-अर्चना के बाद नवपत्रिका प्रवेश का अनुष्ठान संपन्न होता है। इसके उपरांत श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मां दुर्गा के पट खोले जाते हैं।
नवपत्रिका में नौ प्रकार के पौधों को एक साथ बांधकर देवी के विभिन्न स्वरूपों और प्रकृति की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। संस्कृत में ‘नव’ का अर्थ नौ और ‘पत्रिका’ का अर्थ पत्तियों या पौधों के समूह से है। यह अनुष्ठान प्रकृति और देवी उपासना के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है।
मां कालरात्रि का स्वरूप भय से मुक्ति और आंतरिक परिवर्तन का प्रतीक
नवरात्रि के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की महिमा का वर्णन करते हुए पंडित पंकज झा शास्त्री ने कहा कि मां कालरात्रि देवी दुर्गा का उग्र स्वरूप हैं, जो अंधकार, अज्ञान और भय के नाश का प्रतीक मानी जाती हैं। उनका आध्यात्मिक स्वरूप साधक को आंतरिक परिवर्तन, साहस और नकारात्मकता से मुक्ति का संदेश देता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कालरात्रि की उपासना से शनि की साढ़ेसाती, ढैया और प्रतिकूल प्रभावों से राहत मिलने की कामना की जाती है। भक्त उनसे भय, शत्रु बाधा और अनिष्ट से रक्षा की प्रार्थना करते हैं। साधना परंपरा में मां कालरात्रि का संबंध सहस्रार चक्र से भी माना जाता है, जिसे आध्यात्मिक चेतना और उच्च अनुभूति का केंद्र कहा गया है।
मां कालरात्रि का स्वरूप काले वर्ण, खुले केश, तीन नेत्र और गर्दभ वाहन के साथ वर्णित है। उनका रूप भले ही उग्र हो, लेकिन भक्तों को शुभ फल प्रदान करने के कारण वे ‘शुभंकरी’ कहलाती हैं। उनकी आराधना का संदेश है कि कठिन परिस्थितियों और अंधकार के बीच भी साहस, विश्वास और सकारात्मकता बनाए रखनी चाहिए।
शनिवार को महा सप्तमी व्रत
पंचांग के अनुसार, महा सप्तमी तिथि शनिवार को सुबह 6 बजकर 5 मिनट तक रहने के बाद अष्टमी तिथि आरंभ होने का उल्लेख किया गया है। शनिवार को महा सप्तमी व्रत और इससे जुड़े धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा के साथ किए जाएंगे। पूजा समितियां नवपत्रिका प्रवेश और अन्य पारंपरिक विधियों की तैयारियों में जुटी हैं।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

Comments