नुकताचीनी की आदत ने अपनों से किया दूर, बुढ़ापे में अकेले रह गए रिटायर्ड प्रिंसिपल
नुकताचीनी की आदत ने अपनों से किया दूर, बुढ़ापे में अकेले रह गए रिटायर्ड प्रिंसिपल
जनक्रांति कार्यालय से जॉली अंकल की रिपोर्ट
दूसरों की छोटी-छोटी गलतियां निकालने की आदत ने उजाड़ दी हरीश बाबू की खुशहाल गृहस्थी, डॉक्टर की सीख से हुआ अपनी भूल का एहसास
विशेष आलेख | नुकताचीनी
रिटायर्ड प्रिंसिपल हरीश बाबू के जीवन का एक ही सिद्धांत बन गया था—दूसरों की गलतियां निकालना। स्कूल में तीन दशक तक बच्चों की कॉपियों पर लाल पेन चलाने और अध्यापकों की कमियों पर सवाल उठाने की आदत ने उनके स्वभाव को इतना कठोर बना दिया था कि उन्हें हर अच्छी चीज में भी कोई न कोई खामी नजर आने लगी। सुबह की चाय हो या त्योहार पर पहना जाने वाला नया कपड़ा, बहू के हाथों से बनी स्वादिष्ट सब्जी हो या घर के किसी सदस्य का कोई काम, वे तारीफ करने के बजाय कमियां गिनाने लगते थे।
उनकी इस आदत से घर का माहौल हमेशा तनावपूर्ण बना रहता था। परिवार के सदस्य उनके सामने सहज रहने के बजाय हर समय इस आशंका में रहते थे कि न जाने किस छोटी-सी बात पर उन्हें डांट सुननी पड़ जाए। धीरे-धीरे उनकी लगातार टोका-टाकी से परेशान होकर बेटा और बहू अलग रहने लगे। कुछ समय बाद पत्नी का धैर्य भी जवाब दे गया और वह भी बेटे के पास चली गईं। कभी हंसी-खुशी से गुलजार रहने वाला उनका बड़ा मकान अब वीरान हो चुका था।
एक हादसे ने बदल दी जिंदगी की तस्वीर
एक दिन सुबह बाथरूम की सफाई में कमी निकालते समय हरीश बाबू का पैर साबुन के पानी पर फिसल गया। वह जोर से जमीन पर गिर पड़े और उनकी कमर में गंभीर चोट आ गई। दर्द से कराहते हुए उन्होंने अपने पुराने नौकर रामू को आवाज लगाई। रामू तुरंत उनकी मदद के लिए पहुंचा और पास के डॉक्टर को बुला लाया।
जांच के बाद डॉक्टर ने बताया कि उनकी कमर में गंभीर चोट आई है और उन्हें कम से कम पंद्रह दिनों तक बिस्तर पर आराम करना होगा। यह सुनकर हरीश बाबू घबरा उठे। उन्होंने डॉक्टर से जल्द ठीक करने की गुहार लगाते हुए कहा कि घर के कामकाज और बाजार के लेन-देन की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। वह इतने दिनों तक बिस्तर पर कैसे पड़े रह सकते हैं?
डॉक्टर के एक सवाल ने तोड़ा अहंकार
हरीश बाबू की बेचैनी देखकर डॉक्टर ने उनसे एक सीधा सवाल पूछा—इतना बड़ा परिवार होने के बावजूद इस मुश्किल समय में उनकी सेवा करने के लिए घर पर कोई अपना क्यों नहीं है? बेटा, बहू और पत्नी आखिर कहां चले गए?
यह सवाल सुनते ही हरीश बाबू का सारा रौब और अहंकार टूट गया। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने स्वीकार किया कि दूसरों की कमियां निकालने और हर बात पर नुकताचीनी करने की आदत ने उनके पारिवारिक जीवन को बर्बाद कर दिया। वह हमेशा अपनों की गलतियां देखते रहे, लेकिन कभी उनके प्यार, मेहनत और भावनाओं की कद्र नहीं कर सके। नतीजा यह हुआ कि आज उनके पास एक बड़े मकान के अलावा कुछ भी नहीं बचा था। उनकी देखभाल करने वाला केवल पुराना नौकर रामू ही था।
रिश्ते पूर्णता से नहीं, प्रेम और स्वीकार्यता से चलते हैं
डॉक्टर ने उन्हें समझाया कि जिंदगी कोई स्कूल की परीक्षा नहीं है, जहां हर समय दूसरों की गलतियां ढूंढने के लिए लाल पेन लेकर बैठा जाए। कोई भी इंसान पूरी तरह परिपूर्ण नहीं होता। हर व्यक्ति से कभी न कभी कोई चूक हो सकती है। ऐसे में छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करना और अपनों की भावनाओं को समझना ही अच्छे रिश्तों की बुनियाद है।
डॉक्टर ने कहा कि लगातार नकारात्मक सोचने और दूसरों को टोकते रहने से व्यक्ति खुद भी तनाव में रहता है और अपने करीबियों को भी दूर कर देता है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर धन-दौलत और आलीशान मकान से ज्यादा महत्व अपने लोगों के साथ, उनके स्नेह और उनकी उपस्थिति का होता है।
सीख: कमियां नहीं, खूबियां देखना सीखें
डॉक्टर की बातें हरीश बाबू के दिल में उतर गईं। उन्हें एहसास हुआ कि दूसरों को सुधारने की कोशिश में उन्होंने अपने ही रिश्तों को कमजोर कर दिया था। उन्होंने मन ही मन संकल्प लिया कि अब वह हर छोटी बात पर नुकताचीनी करने के बजाय लोगों की अच्छाइयों को पहचानेंगे और अपने व्यवहार में बदलाव लाएंगे।
हरीश बाबू की कहानी समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। आलोचना करना आसान है, लेकिन किसी की मेहनत की सराहना करना, उसकी गलतियों को माफ करना और उसे अपनापन देना कहीं अधिक जरूरी है। रिश्ते किसी की कमियां गिनाने से नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान, धैर्य और समझदारी से मजबूत होते हैं।
याद रखिए, दूसरों की गलतियां खोजते-खोजते कहीं ऐसा न हो कि हम अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती कर बैठें और जब अपनों की जरूरत पड़े, तब हमारे पास पछतावे के सिवा कुछ न बचे।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

Comments