विश्वास का संकट: आखिर किस पर करें भरोसा?
विश्वास का संकट: आखिर किस पर करें भरोसा?
जौली अंकल की कलम से
रिश्तों से राजनीति तक शक के घेरे में इंसानियत, भरोसे की डोर टूटने से बढ़ रही दूरियाँ
आज की दुनिया में विश्वास का अकाल इस कदर गहराता जा रहा है कि कभी-कभी यह सोचकर मन व्यथित हो उठता है कि आखिर इंसान अपनी इंसानियत को किस मोड़ पर छोड़ आया है। एक दौर था, जब अपनों की जुबान ही सबसे बड़ी गारंटी हुआ करती थी और किसी के एक वादे पर लोग अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार रहते थे। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि कोई सच भी बोल दे, तो लोग उसके पीछे छिपे मकसद की तलाश करने लगते हैं। इंसान की जुबान, जो कभी भरोसे की सबसे मजबूत पूंजी हुआ करती थी, आज संदेह के कटघरे में खड़ी दिखाई देती है। जब रेहड़ी-पटरी वाले से लेकर बड़े शोरूम के मालिक तक हर ग्राहक को शक की निगाह से देखने लगें, तो समझ लीजिए कि समाज में विश्वास की नींव कमजोर पड़ रही है। यहां तक कि मंदिरों में भी सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि सुरक्षा के बढ़ते इंतजामों के बीच कहीं आपसी विश्वास तो पीछे नहीं छूटता जा रहा है।
पैसों के लेन-देन में विश्वास की परीक्षा सबसे ज्यादा होती है। किसी परिचित को जरूरत के समय उधार देना कभी इंसानियत और रिश्तों की निशानी माना जाता था, लेकिन आज कई बार इसका नतीजा पैसा गंवाने के साथ-साथ रिश्ता खोने के रूप में भी सामने आता है। पैसे मांगते समय कुछ लोग ऐसे मीठे बोल बोलते हैं, मानो उनसे बड़ा शुभचिंतक कोई हो ही नहीं। लेकिन जब रकम लौटाने की बारी आती है, तो उनका फोन बंद हो जाता है या फिर वे ऐसी व्यस्तता का हवाला देने लगते हैं, जैसे दुनिया का सारा काम उन्हीं के कंधों पर हो। आखिर कब तक भरोसे के नाम पर दूसरों की ईमानदारी की परीक्षा होती रहेगी? हालांकि, इसका मतलब यह भी नहीं कि हर जरूरतमंद को शक की निगाह से देखा जाए। जरूरत है विवेक और विश्वास के बीच संतुलन बनाने की। क्योंकि विश्वास बाजार में बिकने वाली कोई वस्तु नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाला वह अनमोल रिश्ता है, जिसे बनाने में वर्षों लगते हैं और टूटने में एक पल भी नहीं।
लोकतंत्र में भी भरोसे की डोर लगातार परीक्षा से गुजरती है। चुनाव से पहले नेताओं के वादे जनता के मन में उम्मीदों के दीप जलाते हैं, लेकिन जब चुनाव के बाद उन वादों पर अमल नहीं होता, तो लोगों का विश्वास डगमगाने लगता है। जनता आखिर किस उम्मीद के सहारे अपने प्रतिनिधियों पर भरोसा करे, यदि उसके सवालों का जवाब केवल आश्वासनों में मिलता रहे? दूसरी ओर, समाचार माध्यमों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। जब खबरों में तथ्य और अफवाह, निष्पक्षता और पक्षपात के बीच अंतर करना मुश्किल होने लगे, तो आम आदमी के लिए सच्चाई तक पहुंचना चुनौती बन जाता है। इसी तरह, जिन धार्मिक और सामाजिक व्यक्तित्वों को लोग श्रद्धा और आदर्श का प्रतीक मानते हैं, उनसे जुड़े गलत आचरण के मामले सामने आने पर लोगों की आस्था को भी ठेस पहुंचती है। नतीजा यह है कि आम इंसान धोखे और दिखावे से भरी दुनिया में खड़ा यही सोचता रह जाता है कि आखिर आंख मूंदकर भरोसा किस पर किया जाए।
विश्वास का यह संकट अब केवल बाजार, राजनीति या सार्वजनिक जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि घर की चौखट के भीतर भी पहुंच चुका है। पति-पत्नी के रिश्ते हों, भाई-बहन का अपनापन हो या माता-पिता और बच्चों के बीच का संवाद, हर जगह संदेह की दीवारें खड़ी होती दिखाई देती हैं। मोबाइल फोन के पासवर्ड, छिपी हुई बातें और एक-दूसरे की हर गतिविधि पर नजर रखने की आदत कई बार रिश्तों में अनावश्यक तनाव पैदा कर देती है। तकनीक अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब उसका इस्तेमाल संवाद बढ़ाने के बजाय शक को हवा देने लगे, तो रिश्तों की मिठास फीकी पड़ने लगती है। भागदौड़ भरी जिंदगी, समय की कमी और हर परिस्थिति में खुद को ज्यादा समझदार साबित करने की होड़ ने भी लोगों के बीच संवाद की जगह संदेह को बढ़ावा दिया है। जब अपने ही एक-दूसरे पर विश्वास खोने लगें, तो घर की चारदीवारी तो बची रहती है, लेकिन उसके भीतर का सुकून धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है।
आखिर इस बिगड़ते माहौल को सुधारा कैसे जाए? इसका जवाब दूसरों को बदलने की मांग करने से पहले खुद को बदलने में छिपा है। हमें अपनी बात और व्यवहार में ईमानदारी रखनी होगी, वादों को निभाने की आदत डालनी होगी और गलतियों को स्वीकार करने का साहस जुटाना होगा। रिश्तों में शक पैदा होने पर चुप्पी और आरोपों के बजाय खुलकर बातचीत करनी चाहिए। साथ ही, विश्वास करने का अर्थ आंखें बंद कर लेना भी नहीं है। भरोसे के साथ विवेक, पारदर्शिता और जिम्मेदारी का होना उतना ही जरूरी है। किसी पर विश्वास करना अच्छी बात है, लेकिन उस विश्वास को बनाए रखने के लिए अपने आचरण से ईमानदारी साबित करना उससे भी बड़ी बात है।
दोस्तों, आपके अपने जौली अंकल का मानना है कि जिंदगी बहुत छोटी है। इसे शक, शिकायत और अविश्वास की आग में जलाने के बजाय प्यार, अपनापन और ईमानदारी से सजाना चाहिए। शक की ऐनक उतारकर अपनों को समझने की कोशिश कीजिए, अपनी नीयत साफ रखिए और दूसरों के विश्वास को कभी खिलवाड़ मत समझिए। याद रखिए, विश्वास कांच की तरह नाजुक जरूर है, लेकिन जब इसे ईमानदारी और संवेदनशीलता का सहारा मिलता है, तो यह सबसे मजबूत रिश्तों की नींव बन जाता है। आइए, हम सब मिलकर ऐसी दुनिया बनाने का संकल्प लें, जहां इंसान की पहचान उसके वादों से नहीं, बल्कि उन वादों को निभाने के उसके चरित्र से हो। क्योंकि जिस दिन इंसान का इंसान पर भरोसा लौट आएगा, उसी दिन इंसानियत की खोई हुई मुस्कान भी लौट आएगी।
समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक/संपादक राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित।

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